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इटावा में सवाल पूछना पड़ा भारी? पत्रकार की गिरफ्तारी से उबाल पर मामला

इटावा में सवाल पूछना पड़ा भारी? पत्रकार की गिरफ्तारी से उबाल पर मामला

इटावा। जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछना अगर जुर्म बन जाए, तो लोकतंत्र की असली हालत क्या होगी—इटावा का यह ताजा मामला यही सोचने पर मजबूर कर रहा है।
स्थानीय पत्रकार असित यादव की गिरफ्तारी के बाद जिले का माहौल गरमा गया है। पत्रकारों के बीच आक्रोश साफ दिखाई दे रहा है और लोग इसे सीधे तौर पर “सवाल दबाने की कोशिश” बता रहे हैं।
बताया जा रहा है कि असित यादव ने क्षेत्रीय सांसद जितेंद्र दोहरे से उनके पुराने वादे—गुरु गोरखनाथ और जाहरवीर बाबा मंदिर पर लाइट लगवाने—को लेकर सवाल उठाया था। यह वही मुद्दा था, जो लंबे समय से स्थानीय लोगों के बीच चर्चा में था।
आरोप है कि सवाल पूछने के बाद पत्रकार को बातचीत के बहाने बुलाया गया और फिर अचानक उनके खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी का मामला दर्ज करा दिया गया। इसके बाद पुलिस ने उन्हें फ्रेंड्स कॉलोनी थाने में हिरासत में ले लिया।
इस पूरी कार्रवाई ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या अब पत्रकार सवाल पूछने से पहले इजाजत लेंगे?
क्या जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगना अपराध की श्रेणी में आ गया है?
स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि अगर इस तरह की घटनाएं बढ़ीं, तो जमीनी पत्रकारिता पूरी तरह दब जाएगी। उनका साफ कहना है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आवाज पर दबाव बनाने की कोशिश है।
समाज के कई लोगों ने भी इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है कि अगर कोई आरोप है, तो उसकी पारदर्शी जांच होनी चाहिए, लेकिन सवाल पूछने वाले को ही कठघरे में खड़ा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक संकेत नहीं है।
यह मामला अब केवल एक गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह अभिव्यक्ति की आज़ादी और मीडिया की स्वतंत्रता की कसौटी बनता जा रहा है।
अब देखना होगा—क्या सच सामने आएगा या सवाल पूछने की कीमत यूं ही चुकानी पड़ेगी।

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